Arunima Sinha | Worlds 1st Female Amputee to Climb Mount Everest (हिंदी में भी)

Journey from Death to Mountain Peak

best climber and volleyball plyaer
Read In English & Hindi

This is not a story but a reality, which became the first Indian woman disabled to beat Death and conquer Mount Everest. He is an Indian climber and (volleyball) player. He is an Indian mountaineer and (volleyball) player who fulfilled his dream with his passion and determination and today knows the whole world.

Name: - Dr. Arunima Sinha
Arunima Sinha (Sonu) was born in a Kasayath family in Ambedkar Nagar in Lucknow, Uttar Pradesh, now in the CRPF Central Industrial Security Force (Head Constable).
                                   12 April 2011 This black night when she was going from Lucknow to Dehradun by train, when some miscreants or criminals tried to snatch her gold chain near Bareilly, she was thrown out of the train at the same time. The train was running from the second track, which caused it to crash and fell down. After some time, when she regained consciousness, she saw that one leg was cut and the other leg bone and flesh was stuck in jeans. She kept screaming in pain throughout the night and kept on seeing the arrival of 7 hours and 49 trains but there was no time when it was going to stop appearing in the eyes but the vibration of the train tracks kept her awake. This is why you did not want to give up, he says that the one who supports himself, his God also supports him, he did not lose courage. He kept on fighting with the stones of insects, the pain of the train, etc.
                               The next morning Arunima, who was eyeing the villagers, was immediately taken to the district hospital in Bareilly for first aid, but she lacked the treatment that Arunima realized and the doctors were talking about cutting her leg. After listening to what she had heard, she told the doctors that if I had to cut one leg to do the treatment, she was bitten. Hearing Arunima's courageous thing, the doctor started the treatment and the doctors and pharmacists also gave their 1- 1 unit of blood then from there. Lucknow and then AIIMS Delhi were taken for treatment.
During this time she continued to fight to the death like a warrior, but the people of this society started misinforming her as if she had gone to travel without a ticket or committing suicide, not knowing how much she thought and decided No matter what I was before and what I am today, I have to prove myself further! Then he thought of doing it that even the common man is nervous to do it.
                                      People told him to go crazy and cynical because of the fact that 1 leg has been cut and Pete has broken three places in the bone and a lot of wounds, due to which everyone was advising to do a restful job but Arunima proved something different. Was because she was determined to do mountaineering, she found sponsorship and trainer and then got into mountaineering.
                                       Initially, there was a lot of difficulty, her wounds and pain were not supporting the weather patterns, but she went ahead of her courage, even ahead of her colleagues, who were surprised by their companions because the snowy air temperature on Mount Everest is not easy. The one whom Arunima had defeated, on her own, which is not a matter of all! How many may be the opposite, but our aim should be to achieve the goal.

                                   Then came the day when history was to be written May 21, 2013, the Indian tricolor (Flag) was hoisted in the summit of Mount Everest at 10.55 and 8848 meters, and became the first Indian woman Disability to conquer Mount Everest. Arunima Sinha is a great example for those people who think that disability comes between their dreams and passion and they lose courage. It is a living example of women power, no matter how adverse the circumstances are but our aim should be to achieve the goal needed.

Spoken by
"The real flight of this eagle is yet to come, yet the test of this bird is yet to be crossed, the oceans are still full sky"
Padam Shri 2015 (There is more)

मृत्यु से पर्वत शिखर का सफर

ये कहानी नहीं बल्कि हकीकत है जो मृत्यु को हराकर माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली पहली भारतीय महिला दिव्यांग बनी! वह एक भारतीय पर्वतारोही और वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं जिसने अपने जूनून और दृढ़संकल्प से अपना सपना पूरा किया और आज पूरी दुनिया जानती है!
नाम डॉ. अरुणिमा सिन्हा

                                              अरुणिमा सिन्हा (सोनू का जन्म एक कास्यथ परिवार में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अम्बेडकर नगर में हुआ अभी वो सीआरपीएफ केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षाबल में है!

                                             12 अप्रैल 2011 यह वह काली रात जब वह रेलगाड़ी से लखनऊ से देहरादून जा रही थी तभी रेलगाड़ी में कुछ बदमाशो या अपराधियों ने बरेली के पास उसके सोने की चैन को छीनने की कोशिश किया नहीं छीन पाए तो उसे रेलगाड़ी से बाहर फेंक दिया गया उसी समय दूसरी पटरी से रेलगाड़ी आरही थी जिससे वो टकराकर नीचे गिर गई कुछ समय बाद होश आया तो उसने देखा की एक पैर कट हुवा व दूसरा पैर की हड्डी और मांस जीन्स में अटका पड़ा था!  वह रात भर दर्द से चिल्लाती रही 7 घण्टा और 49 रेलगाड़ियों का आना जाना देखती रही लेकिन कोई वंहा पे नहीं आया एक समय ऐसा हो गया था की आँखों से दिखाई देना बंद हो रहा था लेकिन रेलगाड़ी के पटरी के वाइब्रेशन ने जगाए रखा वह बेहतरीन खिलाडी रही इसी लिए हो हारना नहीं चाह रही थी वो कहते है जो खुद का साथ देता है उसका भगवान भी साथ देता है उसने हिम्मत नहीं हारी वो लड़ती रही वंहा के पत्थर कीड़े मकोड़ों दर्द रेलगाड़ी की लाइट इत्यादि से!

                                          अगली सुबह गाँव वालो की नज़र अरुणिमा पर पड़ी उसे तुरंत बरेली के जिला हॉस्पिटल में प्राथमिक उपचार के लिए ले जाया गया परन्तु वह उपचार के लिए अभावो की कमी थी जिसका एहसास अरुणिमा को हो गया था तथा डॉक्टर उनकी एक पैर काटने की बात कर रहे थे जो वो सुन ली थी फिर उसने डॉक्टरों से कहा की अगर उपचार करने में मेरा एक पैर काटना पड़े तो काट ली जीए अरुणिमा की साहसी भरा बात सुन डॉक्टर उपचार चालू किया तथा डॉक्टरो और फार्मासिस्ट ने भी अपना 1- 1 यूनिट खून दिए फिर वहां से लखनऊ और फिर एम्स दिल्ली उपचार के लिए ले जाया गया! इस दौरान वह योद्धा की तरह मौत से जंग लड़ती रही लेकिन इस समाज के लोगो ने उसके बारे गलत बाते करना चालू कर दिया था जैसे की वो बिना टिकट के यात्रा या आत्महत्या करने गई थी जाने बहुत कुछ तभी उसने सोचा और मन में ठान की मैं पहले क्या थी और आज क्या हूँ मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे आगे अपने आप को साबित करना है! फिर उसने ऐसा करने का सोचा कि आम आदमी भी इसे करने के लिए घबराता है वह है!
                                             पर्वतारोहण करने की बात बताई लोग उसे पागल और सनकी कहने लगे क्यों की 1 पैर कट गया है पीट के हड्डी में तीन जगह से टूट गई है और बहुत सारे घाव जिसके कारण आराम वाली नौकरी करने सब सलाह दे रहे थे लेकिन अरुणिमा कुछ अलग साबित करना था क्योंकि वह ठान ली थी कि पर्वतारोहण ही करना है उसने प्रायोजन और ट्रेनर ढूंडा और फिर माउंटेनियरिंग में लग गई!

                                           शुरुवात बहुत दिक्कत आई उसके घाव दर्द मौसम के मिजाज साथ नहीं दे रहे थे परन्तु हिम्मत के आगे की का चली वह अपने संथियो से भी आगे चली जाती थी जिसे देख उनके साथी हैरान हो जाते थे क्योंकि माउंट एवेरेस्ट पर बर्फ हवा तापमान आसान नहीं होता जिसे अरुणिमा हरी चुकी थी अपने दम पर जो सब की बात नहीं होती है!

                                           फिर वो दिन आया जब इतिहास लिखा जाना था 21 मई 2013 रात्री 10-55 और 8848 मीटर ऊंचाई चढ़ के माउंट एवेरेस्ट के शिखर में भारतीय तिरंगा लहराया और माउंट एवेरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला दिव्यांग बनी! अरुणिमा सिन्हा उन लोगो के लिए मिशाल है जो ये सोचते की विकलांगता उनके सपनों और जूनून के बीच जाती और वो हिम्मत हार जाते है यह नारी शक्ति का जीता जगता उदहारण है की चाहे परिस्थितियां कितनी विपरीत क्यों हो लेकिन लक्ष्य हासिल करना हमारा उद्देश्य होना चाहिए!

इनके द्वारा कही बाते
अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है अभी तो इस परिंदे का इम्तिहान बाकी है अभी अभी लांघा है समुद्रों को अभी तो पूरी आसमान बाकी है!


पदम् श्री 2015 (और भी है)

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